Tuesday, August 12, 2014

मेरे आईने की परछाइयां

पकड़ पकड़ बूंदे
मन में बरसाते भर लूं

जब भी मन तप जाए
गरमी में घरती सा ...
तुम्हें पुकारूं मन के मौसम
तभी बदल लूं
मन में मेरे इसी तरह से
मौसम सारे
सागर सारे
धूल आंधिया
जमा रखे हैं
मन में मेरे
ईश्वर की पूरी सृष्टि है
बाहर क्या
भीतर रहकर ही उसको पाऊँ
वहीं मेरा नाविक है
वहीं मेरी किश्ती है
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