Sunday, May 17, 2015

मेरे आईने की परछाइयाँ









मेरी सड़कों के किनारे आओ
एक आलोक गुलाबी देखो
जो बरसता है पैनी बूंदों सा

एक सन्नाटा बड़ा ऊंचा है 
इतना ऊंचा कि आसमानों को
छूता रहता है हाथ रख सर पर

मैंने उससे ही हँसना सीखा है .

मेरे आईने की परछाइयां







बरसातों में 
बादल से घिर 
टापू बनकर 
भीग भीग कर 

सभी पुराने
पत्र तुम्हारे
तनहा तनहा
दोहराए थे