यही रस्ता है जो तुमको
मेरे घर लेके जाएगा
वहाँ उस ऊंची सी चोटी के पीछे ...
गाँव है मेरा
वहीं उस गाँव में छोटा सा घर है
एक सपने का
उसी सपने के जैसे घर में अपने पर को फैलाए
पड़ी रहती है शहज़ादी
उसे बचपन की बातों से चुराकर मैंने रक्खा है
मेरा बचपन जवानी और मेरी आखिरी साथी
वो मेरे साथ होती है
मैं उसके घर में रहता हूँ ...
जब आओगे तुम्हें मैं उसकी बातें भी सुनाऊंगा
चले आना किसी दिन
रात के कोमल अंधेरों में
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