Wednesday, August 13, 2014

मेरे आईने की परछाइयां





यही रस्ता है
जो तुमको
मेरे घर लेके जाएगा

वहाँ उस ऊंची सी चोटी के पीछे ...
गाँव है मेरा
वहीं उस गाँव में छोटा सा घर है
एक सपने का
उसी सपने के जैसे घर में अपने पर को फैलाए
पड़ी रहती है शहज़ादी

उसे बचपन की बातों से चुराकर मैंने रक्खा है
मेरा बचपन जवानी और मेरी आखिरी साथी
वो मेरे साथ होती है
मैं उसके घर में रहता हूँ ...

जब आओगे तुम्हें मैं उसकी बातें भी सुनाऊंगा
चले आना किसी दिन
रात के कोमल अंधेरों में

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