तुम्हारे साथ ने कुछ लम्हों को कुतर दिया है ... और ये दिन हैं जब रद्दी बेचने के लिए बहुत सी बातों को ढेर बना कर सामने रखना पड़ता है ... इन कुतरे हुए लम्हों को उलझनों की तरह अंगूठे और छोटी उंगली के गिर्द मंजे सा लपेटे जा रहें हैं ... फैंक दे ... बेच दें ... या सहेज ले ...
Tuesday, August 12, 2014
मेरे आईने की परछाइयाँ
तुम उठके चल दिए थे जो बिन बात ही उस दिन कुछ देर तक ठिठक के घटा सोचती रही फिर इस तरह बरस के ... गिरी इस तरह गिरी हफ़्तों तलक अकेली सड़क भीगती रही
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