तुम्हारे साथ ने कुछ लम्हों को कुतर दिया है ... और ये दिन हैं जब रद्दी बेचने के लिए बहुत सी बातों को ढेर बना कर सामने रखना पड़ता है ... इन कुतरे हुए लम्हों को उलझनों की तरह अंगूठे और छोटी उंगली के गिर्द मंजे सा लपेटे जा रहें हैं ... फैंक दे ... बेच दें ... या सहेज ले ...
Sunday, August 17, 2014
Wednesday, August 13, 2014
मेरे आईने की परछाइयां
यही रस्ता है जो तुमको
मेरे घर लेके जाएगा
वहाँ उस ऊंची सी चोटी के पीछे ...
गाँव है मेरा
वहीं उस गाँव में छोटा सा घर है
एक सपने का
उसी सपने के जैसे घर में अपने पर को फैलाए
पड़ी रहती है शहज़ादी
उसे बचपन की बातों से चुराकर मैंने रक्खा है
मेरा बचपन जवानी और मेरी आखिरी साथी
वो मेरे साथ होती है
मैं उसके घर में रहता हूँ ...
जब आओगे तुम्हें मैं उसकी बातें भी सुनाऊंगा
चले आना किसी दिन
रात के कोमल अंधेरों में
Tuesday, August 12, 2014
मेरे आईने की परछाइयां
पकड़ पकड़ बूंदे
मन में बरसाते भर लूं
जब भी मन तप जाए
गरमी में घरती सा ...
तुम्हें पुकारूं मन के मौसम
तभी बदल लूं
मन में मेरे इसी तरह से
मौसम सारे
सागर सारे
धूल आंधिया
जमा रखे हैं
मन में मेरे
ईश्वर की पूरी सृष्टि है
बाहर क्या
भीतर रहकर ही उसको पाऊँ
वहीं मेरा नाविक है
वहीं मेरी किश्ती है See More
मन में बरसाते भर लूं
जब भी मन तप जाए
गरमी में घरती सा ...
तुम्हें पुकारूं मन के मौसम
तभी बदल लूं
मन में मेरे इसी तरह से
मौसम सारे
सागर सारे
धूल आंधिया
जमा रखे हैं
मन में मेरे
ईश्वर की पूरी सृष्टि है
बाहर क्या
भीतर रहकर ही उसको पाऊँ
वहीं मेरा नाविक है
वहीं मेरी किश्ती है See More
तुम्हारा होना ...
जिंदगी में देर तक रुके आशिर्वाद से हो तुम ...
बुदबुदाए गए
शुभकामनाओं के शब्दों से हो तुम
तुम्हारा होना किसी भावना का
आस पास बने रहना है
अगर खो गए तो ...
सांझ के बिना रात सी आती रहेगी हर तारीक
खुले दरवाज़े छोड़ कर जाती रहेगी ज़िन्दगी ...
बुदबुदाए गए
शुभकामनाओं के शब्दों से हो तुम
तुम्हारा होना किसी भावना का
आस पास बने रहना है
अगर खो गए तो ...
सांझ के बिना रात सी आती रहेगी हर तारीक
खुले दरवाज़े छोड़ कर जाती रहेगी ज़िन्दगी ...
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