तुम्हारे साथ ने कुछ लम्हों को कुतर दिया है ... और ये दिन हैं जब रद्दी बेचने के लिए बहुत सी बातों को ढेर बना कर सामने रखना पड़ता है ... इन कुतरे हुए लम्हों को उलझनों की तरह अंगूठे और छोटी उंगली के गिर्द मंजे सा लपेटे जा रहें हैं ... फैंक दे ... बेच दें ... या सहेज ले ...
Monday, July 20, 2020
तिड़कते हुए लम्हे ...
मेरी आवाज़ करवटें लेती धीरे धीरे से जाग जाती है
मौसम खामोश होते है ... बरसातें खामोश नहीं होतीं ...
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