तुम्हारे साथ ने कुछ लम्हों को कुतर दिया है ... और ये दिन हैं जब रद्दी बेचने के लिए बहुत सी बातों को ढेर बना कर सामने रखना पड़ता है ... इन कुतरे हुए लम्हों को उलझनों की तरह अंगूठे और छोटी उंगली के गिर्द मंजे सा लपेटे जा रहें हैं ... फैंक दे ... बेच दें ... या सहेज ले ...
Sunday, May 17, 2015
मेरे आईने की परछाइयां
बरसातों में बादल से घिर टापू बनकर भीग भीग कर सभी पुराने पत्र तुम्हारे तनहा तनहा दोहराए थे
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